August, 2009

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मैं और मेरा खुदा

 किसी से क्यों कहें हमने क्या खोया क्या पाया है ज़िंदगी मे

कोई कौन होता है मेरे और खुदा के दरमियाँ आने वाला

मैं तो बस मानता रहा हर कही इस दिल की

खुदा ही तो था कभी सब छिनने तो कभी सब देने वाला

नही बदल पाया कभी मैं, ज़ो लिखा था उसने

कुछ माथे तो कुछ हाथों की लकीरों में

वही है जिसने भेजा था ज़मीन पर सासें देकर

और वही होगा एक दिन मुझे मौत देने वाला