April, 2009

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एक कविता और लिख लेने दो

अभी तो हूँ मैं ख्वाओं में कुछ देर मुझे और सोने दो

चंद लम्हे ही सही इस ज़ीवन के हंस के तो जी लेने दो.

कल क्या हो किसने जाना, आखों मे ये नींद भी हो ना हो

सर पर हो आसमां और उसमें झिलमिल सितारे हो ना हो

ओस के जैसे मुझको भी बादलों पर तो उड़ लेने दो

इन ताज़ी बहती हवाओं को सीने मे तो भर लेने दो

ना जाओ, अभी ठहरो तुमसे मुझे कुछ कहना है

दिल मे दबी सारी बातें होठों से तो कह लेने दो

मत रोको मेरे हाथों को जब तब इनमे दम है बाकी

जाते जाते भी मुझको एक कविता और लिख लेने दो